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अक्श को तेरे मिटाना संभव भी हो तो कैसे ? तू हो न हो, आखिर दिल तो तेरा ही धड़कता है मुझ में ।
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मोहब्बत पहली बार जब सही न मिली, तो दोबारा कहा से मिलेगी
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अपने मतलब की बारी आई तो सब रिश्ते अच्छे लगने लगे, और जब अपनों की बारी आई तो सब बुरे लगने लगें।
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जिस दिन मुझे खो दोगे उस दिन मुस्कुराते हुए भी रो दोगे
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मुझको नोच कर ले गया जिसको जितनी ज़रूरत थी मेरी.
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तकलीफ खुद ही कम हो गई, जब अपनों से उम्मीद कम हो गई ।
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ना जाने कितनी उम्मीदें मर गईं मेरे अंदर, अब तो मुझे अपना दिल भी कब्रिस्तान सा लगता है…!
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रिश्तों में अब वफ़ा नहीं, हर कोई बस खुद का फायदा देखता है। मतलब के लिए आते हैं पास, फिर दिल तोड़कर जाते हैं खास।
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इसके बग़ैर घर से निकलना अच्छा नहीं लगता…, तो अब बाज़ार जाते वक़्त भी बस्ता टांग लेते हैं…!!
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दो दिन की जिंदगी है, किसी को नाराज़ न करो, अगर तुमसे कोई प्यार मांगे, तो उसे इनकार न करो।.
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कैसे आवाज दू उसके, जबकि वो मुझे सुनना ही नहीं चाहता
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हम उनके तलाश में यूं ही भटकते रहे, कभी हमें उनका घर न मिला तो कभी वो हमें घर पर ना मिले !